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लक्ष्मी फिल्म रिव्यू – जानिए कैसी है डिज़्नी हॉटस्टार, अक्षय कुमार फिल्म | Laxmii film review streaming on disney hotstar akshay kumar, sharad kelkar


कहानी

कहानी

फिल्म की कहानी है एक हिजड़े की जो मरने के बाद अपना अधूरा काम पूरा करने लौटता है और उसकी आत्मा को साथ मिलता है अक्षय कुमार के किरदार आसिफ के शरीर। आसिफ के शरीर में प्रवेश कर लक्ष्मी अपने और अपने परिवार की मौत का बदला लेने लौटती है और फिल्म की पूरी कहानी बस इसी बिंदु पर आधारित है। पूरी फिल्म इस एक बिंदु से कहीं भी नहीं भटकती है।

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निर्देशन

निर्देशन

कहानी का एक केंद्र होने के बावजूद लक्ष्मी दर्शकों को बांधने में नाकामयाब रहती है। फिल्म की शुरूआत के एक घंटे तो आपको लगभग ऊबने के स्तर तक पहुंचाते हैं और फिल्म की इस असफलता का पूरा श्रेय जाता है राघव लॉरेन्स की कमज़ोर पटकथा और निर्देशन को। वहीं उनका पूरा साथ निभाते हैं फरहाद सामजी, जिनके डायलॉग्स ना याद रहते हैं और ना ही उनका पटकथा में सहयोग फिल्म को हिंदी दर्शकों के मुताबिक बांध पाता है।

अभिनय

अभिनय

अगर बात की जाए अभिनय की तो अक्षय कुमार ने भले ही इसे अपने करियर का सबसे बड़ा चैलेंज माना हो लेकिन परदे पर वो बेअसर और बेदम नज़र आते हैं। वहीं कियारा आडवाणी के हिस्से उनका नाम बुलाने और दो चार डायलॉग्स के अलावा और कुछ आया ही नहीं है। तो उनकी अभिनय क्षमता का पैमाना तय कर पाना यहां थोड़ा मुश्किल होगा।

स्टारकास्ट

स्टारकास्ट

लक्ष्मी की कास्टिंग शानदार है। सिवाय इसके लीड कास्ट के। अक्षय कुमार फिल्म में पूरी तरह मिसफिट नज़र आते हैं। हालांकि अपने अपने किरदारों में बाकी सभी ने पूरी जान डालने की कोशिश की है। चाहे वो अश्विनी कलसेकर की कॉमेडी की कोशिश हो या फिर आएशा रज़ा की। वहीं राजेश शर्मा और मनु ऋषि चड्ढा के हिस्से में भी ज़्यादा कुछ आया नहीं है।

सेकंड हाफ में पकड़ती है गति

सेकंड हाफ में पकड़ती है गति

फिल्म गति पकड़ती है दूसरे हाफ में जहां अक्षय कुमार आखिरकार लक्ष्मी के किरदार में दिखाई देते हैं। लेकिन लक्ष्मी की भूमिका में अक्षय एक बार फिर आपको निराश करते ही नज़र आएंगे। आपकी निराशा तब बढ़ेगी जब फिल्म में असली लक्ष्मी की एंट्री होगी क्योंकि वो लक्ष्मी अक्षय कुमार से बिल्कुल अलग है।

म्यूज़िक

म्यूज़िक

लक्ष्मी को एक हॉरर कॉमेडी बताया गया है लेकिन फिल्म का म्यूज़िक और बैकग्राउंड म्यूज़िक इससे बिल्कुल इतर है। ना ही हल्के फुल्के सीन के दौरान म्यूज़िक मदद करता है और ना ही हॉरर सीन में बैकग्राउंड म्यूज़िक ही दर्शकों के मन में डर पैदा कर पाता है। दोनों ही पक्षों में फिल्म औंधे मुंह गिर जाती है। वहीं ज़बरदस्ती के ठूंसे हुए गाने फिल्म को और ढीला और लचर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी पक्ष

बात करें प्रोडक्शन की तो वसीक़ खान और रजत पोद्दार के डिज़ाइन और रजिंदर शर्मा का आर्ट डायरेक्शन प्रभावशाली है और अपना काम करता है। चाहे बाबा की मज़ार के सीन हों, भूत भगाने की कोशिश हो या फिर फिल्म का क्लाईमैक्स, कहीं ना कहीं, आपको ये सीन फिल्म में बांधे रखने की कोशिश में सफल होते हैं। फिल्म आपके हाथ से छूटती है तो केवल अपनी कमज़ोर लेखन और कॉमेडी की ज़बरदस्ती कोशिश के चलते।

सबसे मज़बूत पक्ष

सबसे मज़बूत पक्ष

फिल्म का सबसे मज़बूत पक्ष है फिल्म में असली लक्ष्मी की एंट्री। शरद केलकर की एंट्री के साथ ही आप तुरंत पलक झपकते ही लक्ष्मी की कहानी जानना चाहते हैं और इसका पूरा श्रेय शरद केलकर को दिया जाना चाहिए। वो वाकई इस भूमिका के लिए तालियों और प्रशंसा के हकदार है।

कहां किया निराश

कहां किया निराश

लक्ष्मी बम आपको आखिरी के 40 मिनट छोड़कर बाकी हर जगह निराश करती है। इसके कारण कई हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है साउथ की छाप के साथ ये फिल्म हिंदी दर्शकों परोसना। और यहीं निर्देशक राघव लॉरेन्स मात खा जाते हैं। क्लाईमैक्स में भी फिल्म का एक्शन आपको बचकाना लगता है। ना ही फिल्म डराती है और ना ही आपके मन में लक्ष्मी के लिए सहानुभूति ला पाती है।

देखें या ना देखें

देखें या ना देखें

कुल मिलाकर ये फिल्म अगर आप देखना चाहते हैं तो इसे शरद केलकर के लिए देखें। लेकिन उसके लिए आपको काफी इंतज़ार करना पड़ेगा और तब तक शायद आपका संयम जवाब दे जाएगा। इसलिए अगर लक्ष्मी देखें, तो अपने मूड को ध्यान में रखते हुए ही इस फिल्म को देखें।


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